Poetry by Dr.Rahat Indori. Andar ka zahar choom liya, dhul ke aa gaye (अंदर का ज़हर चूम लिया, धूल के आ गए)

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अंदर का ज़हर चूम लिया, धूल के आ गए
कितने शरीफ लोग थे सब खुल के आ गए

सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवकूफ
सारे सिपाही माँ के थे घुल और पढ़ें »

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