कविता—-उसका इंतज़ार।

ये भीगी पलके ये सर्द राते और उस पर उसका इंतज़ार ख़त्म होने का नाम नही लेता।

रोज-रोज चली जाती है वो मुझको छोड़कर फिर मिलने के इंतज़ार मे और मै बेक़रार हुआ रहता हूँ उससे मिलने की घड़ियां ख़त्म होने के इंतज़ार मे। और पढ़ें »  

 

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