*में कुमार* नदी के किनारे खड़ा था ! 

तभी वहाँ से *एक लड़की* का *शव* 

नदी में तैरता हुआ जा रहा था।

तो तभी *मेने  उस शव* से पूछा —-

कौन हो तुम ओ सुकुमारी,
*बह रही नदियां के जल में ?*

कोई तो होगा तेरा अपना,

*मानव निर्मित इस भू-तल में !*

किस घर की तुम बेटी हो,

*किस क्यारी की कली हो तुम ?*

किसने तुमको छला है बोलो,

*क्यों दुनिया छोड़ चली हो तुम ?*

किसके नाम की मेंहदी बोलो,

*हांथों पर रची है तेरे ?*

बोलो किसके नाम की बिंदिया,

*मांथे पर लगी है तेरे ?*

लगती हो तुम राजकुमारी,

*या देव लोक से आई हो ?*

उपमा रहित ये रूप तुम्हारा,

*ये रूप कहाँ से लायी हो?*

……….

*सारी बातें सुनकर

*लड़की की आत्मा* बोलती है…

कविराज मुझ को क्षमा करो,

*गरीब पिता की बेटी हूं !*

इसलिये मृत मीन की भांती,

*जल धारा पर लेटी हुँ !*

रूप रंग और सुन्दरता ही,

*मेरी पहचान बताते है !*

कंगन, चूड़ी, बिंदी, मेंहदी,

*सुहागन मुझे बनाते है !*

पिता के सुख को सुख समझा,

*पिता के दुख में दुखी थी मैं !*

जीवन के इस तन्हा पथ पर,

*पति के संग चली थी मैं !*

पति को मेने दीपक समझा,

*उसकी लौ में जली थी मैं !*

माता-पिता का साथ छोड़ 

*उसके रंग में ढली थी मैं !*

पर वो निकला सौदागर,

*लगा दिया मेरा भी मोल !*

दौलत और दहेज़ की खातिर

*पिला दिया जल में विष घोल !*

दुनिया रुपी इस उपवन में,

*छोटी सी एक कली थी मैं !*

जिस को माली समझा,

*उसी के द्वारा छली थी मैं !*

इश्वर से अब न्याय मांगने,

*शव शैय्या पर पड़ी हूँ मैं !*

दहेज़ की लोभी इस संसार मैं,

*दहेज़ की भेंट चढ़ी हूँ में !*

*दहेज़ की भेंट चढ़ी हूँ मैं !!

..Kumar_Shashi®™….. #_तन्हा_दिल…✍Meri Qalam Mere Jazbaat♡

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