सुलगती तो रही खुल के कभी पर जल नहीं पाई,
शायद मैं हालातों के मुताबिक ढल नहीं पाई,
अल्फाज़ भी ना थे और कुछ वक्त भी कम था,

कहना तो बहुत कुछ था मगर मैं कह नहीं पाई,
जो मौसम की तरह थे रंग उन्होंने बहुत बदले,

मैं इंसान थी शायद तभी मैं बदल नहीं पाई,
पत्थरदिल हूँ यूँ तो फर्क मुझको कुछ नहीं पड़ता,

तेरी बेरूखी हमदम मैं फिर क्यों सह नहीं पाई,
मेरी बेचैनियां दर पे तेरे ले आईं फिर मुझको,

सोचा था कि रह लूँगी मगर मैं रह नहीं पाई,
करना था बहुत कुछ वक्त की पर उलझनों में मैं,

उलझी ऐसी कि ता-ज़िंदगी संभल नहीं पाई,

Kumar_Shashi®™….. 

#_तन्हा_दिल…✍Meri Qalam Mere Jazbaat♡

Advertisements