इशारों में होती मुहब्बत होती अगर अल्फाज़ो को खूबसूरती कौन देता…
पत्थर बन के रह जाता ताज़महल अगर इश्क़ इसे अपनी पहचान ना देता…

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मुहब्बत हो जाती है यहाँ सबको मग़र हर कोई वफ़ा का सिला नही देता…

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रोज लेकर आता हूँ एक अफ़साना मग़र अफ़सोस है कोई सिला ही नही देता…

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मुहब्बत से रोशन है सारा ज़माना और कोई इस की निशानी तक नही देता…

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कैसा लिखता हूँ मैं मुहब्बत के जुनूं में अपने जज़्बात काश कोई आके बता देता….

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सोचता हूँ पलकें बन्द करके बैठ जाऊ और रोता ही रहूँ शाम-ओ-सहर…

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हर रंग में ढल कर देख चुका हूँ फिर भी मुहब्बत में वो मुझे सलामी नही देता…

..Kumar_Shashi®™….. 

#_तन्हा_दिल…✍Meri Qalam Mere Jazbaat♡

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